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भीम के पुत्र घटोत्कच का विवाह कामकटंकटा से हुआ. मूर दैत्य की पुत्री होने के कारण उन्हें मोरवी भी कहा गया. जगदंबाभक्त मोरवी अतुलित शक्तियों की स्वामिनी थीं.

दोनों को दैवीय कृपा से एक परम बलशाली पुत्र हुआ जिसका नाम रखा गया बर्बरीक. बर्बरीक भगवती के अनन्य भक्त थे और उन्होंने जगदंबा देवी को प्रसन्नकर अजेय होने का वरदान प्राप्त किया था.

महाभारत युद्ध का शंखनाद हो चुका था. वीर बर्बरीक युद्ध देखने की इच्छा से अपनी पीठ पर तुणीर रखी जिसमें तीन दिव्य तीर थे और घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान कर गए. रास्ते में भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण के वेश में उनसे मिले.

श्रीकृष्ण ने परिचय पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं मोरवीनंदन एक योद्धा व दानी हूं और महाभारत युद्ध देखने जा रहा हूं. इस युद्ध में जो पक्ष पराजित हो रहा होगा मैं उसकी ओर से युद्ध करूंगा.

श्रीकृष्णजी ने पूछा कि आप जिस महासंग्राम में हारने वाले का सहारा बनने जा रहे हैं वहां अर्जुन, कर्ण, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीम, दुर्योधन जैसे अनगिनत महावीर हैं. आपकी तैयारी भी पूरी नहीं लगती क्योंकि आपके पास न तो रथ है और न सेना. आपका तो तूणीर भी नहीं भरा है. इसमें शस्त्र के नाम पर केवल तीन तीर हैं.

बर्बरीक ने कहा- हे विप्रवर आप इन तीरों को साधारण न समझें. स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूजित देवी जगदंबिका द्वारा दिए गए ये तीन तीर इस संग्राम में आए उन सभी महावीरों पर भारी पड़ेंगे.

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