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शुक्राचार्य ने समझाया- दानवेन्द्र! एक साल तक इसकी कोई काट नहीं कर सकता. कूटनीति का सहारा लो. अभी वर्षभर के लिए तुम देवराज इंद्र के साथ संधि कर लो. एक वर्ष तक प्रतीक्षा करो. उसके बाद ही कोई राह निकल सकेगी. उससे पहले किए गए सारे युद्धों का परिणाम यही होगा.
शुक्राचार्य की बात सुनकर दानव कुछ निश्चिन्त हुए. उन्हें असुरगुरू का परामर्श उचित लगा.
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दानवेंद्र ने कहा- गुरुदेव में देवताओं से संधि का प्रस्ताव लेकर जा रहा हूं. वर्षभर मैं पुनः युद्ध की तैयारी करूंगा. अगले वर्ष पुनः आक्रमण करूंगा. आप हमारे लिए भी ऐसा ही कोई सूत्र तैयार कराएं.
दैत्यराज ने गुरू की बात मान ली. इससे शुक्राचार्य बड़े प्रसन्न हुए और बलि को मनुष्यों द्वारा पूज्य होने का आशीर्वाद दिया.
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श्रीकृष्ण ने यह कथा सुनकार युधिष्ठिर से कहा- रक्षासूत्र का मैंने विलक्षण प्रभाव आपको बताया. इससे विजय, सुख, पुत्र, आरोग्य और धन भी प्राप्त होता है. यह रक्षा विधान बाद में रक्षा-बंधन के रूप में आया. बहन अपने भाई से रक्षा का दायित्व लेने लगी.
राजा युधिष्ठिर ने पूछा– भगवन! आपने रक्षासूत्र के प्रभाव के बारे में जो ज्ञान दिया उसे सुनकर आनंदित हूं. पर मेरे मन में एक और जिज्ञासा उत्पन्न हुई है. आपकी अनुमति हो तो निवेदन करूं.
भगवान ने मुस्कुराते हुए युधिष्ठिर को प्रश्न की अनुमति दे दी.
युधिष्ठिर ने पूछा- देवगुरू ने यह उपाय क्यों बताया? जय प्रदान करने वाले इस रक्षासूत्र में ऐसी शक्ति कैसे आती है? यह जानने की भी इच्छा है. कृपया यह भी बताकर मेरा उपकार करें.
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भगवान ने रक्षासूत्र की शक्ति के बारे में बताने को युधिष्ठिर को एक और छोटी सी कथा सुनाई.
भगवान बोले– वामन भगवान ने दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा. बलि को यह अभिमान हो गया था कि वह सबकुछ दे सकते हैं. एक छोटा से वामन तीन पग में क्या ले लेगा. यह सोचकर बलि मन में हंसे. दाता को अभियान नहीं होना चाहिए, अन्यथा दान निष्फल होता है. ऐसा दान अनिष्टकारी साबित होता है.
शुक्राचार्य तो अंतर्यामी थी. उन्होंने देख लिया कि इस दान के बाद बलि के पास कुछ शेष न होगा. उन्होंने बलि को सावधान किया कि यह वामन नहीं नारायण हैं.
बलि ने जब यह जाना कि याचक के रूप में नारायण हैं तो भी वह दान को प्रस्तुत रहे. ऐसा करके बलि ने अपने पूर्व के सभी पापों का तत्काल नाश कर लिया. वह सर्वथा पवित्र हो गए.
गुरू के मना करने बलि वामन भगवान को उनकी इच्छानुसार तीन पग भूमिदान को तैयार थे. भगवान ने बलि को वचनबद्ध किया ताकि वह अपने वचन से पीछे न हटें.
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महान बलि ने दो पग में ही अपना सर्वस्व गंवा दिया. फिर भी विचलित नहीं हुए. तीसरा पग रखने के लिए बलि ने मस्तक आगे कर दिया था. श्रीहरि ने प्रसन्न होकर बलि को पाताल लोक में वास दिया और एक मन्वंतर में इंद्र होने का वरदान दिया.
स्वयं भगवान बलि की पहरेदारी करने लगे. भगवान ने बलि को सूत्र में बांध तो लिया किंतु उन्हें सर्वस्व प्रदान कर दिया. इसीलिए रक्षा सूत्र ऐसा बंधन है जो अभीष्ट प्रदान करता है.
इसी कारण रक्षासूत्र को बांधते समय यह मंत्र पढा जाता है- येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। दानवेन्द्रो मा चल मा चल।।” यानी दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूँ. हे रक्षासूत्र, तुम मेरे साथ रहो चलायमान न हो. (संदर्भ: भविष्यपुराण, महाभारत उत्तर पर्व एवं अन्य पुराण)
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