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देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मेँ पराजित होने लगता है और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो वह क्रुद्ध हो उठता है. क्रोध से शरीर का ताप बढ़ जाता है.
मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्यजी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैँ. इससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि शंकराचार्य की विजय हुई है.
विदुषी भारती का निर्णय सुनकर सभी दंग रह गए. सबने उनकी काफी प्रशंसा की. इसके उपरांत भारती ने शंकराचार्य से कहा कि उनकी जीत आधी है क्योंकि विवाह के बाद पति-पत्नी मिलकर पूर्ण होते हैं.
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Shankaracharya ji ne fir 6 mahine kya kiya?