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एक ब्राह्मण को विवाह के बहुत सालों बाद बहुत पूजा-पाठ के फलस्वरूप एक पुत्र हुआ. परंतु उसकी खुशियों को नजर लग गई.
कुछ वर्षों बाद बालक की एक दिन असमय ही मृत्यु हो गई. परिवार शोकाकुल हो गया.
ब्राह्मण शव लेकर श्मशान पहुंचा. वह मोहवश उसे दफना नहीं पा रहा था. उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए सभी जप-तप और पुत्र का जन्मोत्सव याद आ रहा था.
उस श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार रहते थे. दोनों शव देखकर बड़े खुश हुए.
दोनों ने प्रचलित व्यवस्था बना रखी थी- दिन में सियार मांस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध नहीं खाएगा. मांस के लोभ में वे तरह-तरह के प्रपंच करते रहते थे.
सियार ने सोचा यदि ब्राह्मण दिन में ही शव रखकर चला गया तो उस पर गिद्ध का अधिकार होगा. इसलिए क्यों न अंधेरा होने तक ब्राह्मण को बातों में फंसाकर रखा जाए.
वहीं गिद्ध ताक में था कि शव के साथ आए कुटुंब के लोग जल्द से जल्द जाएं और वह उसे खा सके.
गिद्ध ब्राह्मण के पास गया और उससे वैराग्य की बातें शुरू की.
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