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सभी ब्रह्मा के पास पहुंचे. ब्रह्मदेव भी उलझन में पड़ गए. उन्होंने बीच का रास्ता निकाला- अग्नि और जल दोनों समान रूप से श्रेष्ठ हैं. मेरे द्वारा रची गई सृष्टि में से एक का भी अगर लोप हो जाए तो वह समाप्त हो जाएगी. मैं दोनों को बराबर सम्मान का अधिकारी मानता हूं.

ऋषियों को समझ में आ गया कि ब्रह्मदेव चतुराई से मामले को गोल कर गए. ब्रह्मलोक से लौटते हुए उन्हें वायुदेव नजर आ गए. उनसे भी वही प्रश्न किया गया- वायु ने अग्नि को श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि वह आधार तत्व हैं इसलिए श्रेष्ठ हैं.

दूसरे पक्ष को यह उत्तर स्वीकार नहीं था. वे पृथ्वी के पास गए और निर्णय करने को कहा- पृथ्वी ने जल को श्रेष्ठ बताया. पृथ्वी का तर्क था- सबकुछ जल से पैदा होता है, अग्नि से तो वह स्वाहा हो जाता है. इसलिए जल प्रथम वंदनीय हैं.

विवाद को फिर हवा मिल गई. सबने मिलकर तय किया कि विष्णुलोक चलें. श्रीहरि जो निर्णय देंगे वही सबको स्वीकार होगा. सब क्षीर सागर पहुंचे. भगवान विष्णु ऋषियों के मन में आए ऐसे हीन विचार से क्षुब्ध थे. ऋषियों ने तरह-तरह से उनकी स्तुति की लेकिन उन्होंने दर्शन नहीं दिया.

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