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नारदजी तो एक अजीब उलझन में पड़ गए. उन्होंने चतुराई दिखाई और अप्सराओं को संबोधित कर कहा- हे देवगणिकाओं तुममें से जो स्वयं को सर्वाधिक सुंदर, सरस-संलाप, मोहन विधाओं में श्रेष्ठ समझता हो, वही हमारे समक्ष नृत्य करें.

नारदजी की बात सुनकर सभी अप्सराएं मौन रहीं. एक मुनि के समक्ष वे अपने मुख से कैसे यह स्वीकारें. इंद्र ने नारदजी से कहा कि देवर्षि आप स्वयं यह निर्णय करें कि कौन सर्वांग सुंदर है. फिर वही अप्सरा आपके लिए नृत्य करेगी.

नारदजी ने कहा- मुझे तो नृत्यकला परखना आता नहीं, इसलिए यह मेरे लिए संभव नहीं है. रही बात सौंदर्य की तो इन देव नर्तकियों में से जो नर्तकी दुर्वासाजी को मोहपाश में बांध सकेगी, वही मेरी दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ होगी.

दुर्वासाजी का नाम सुनते ही सभी देव-नर्तकियां भयभीत होकर मौन रही. वपु नामक एक नर्तकी से यह सहन न हुआ.

वह बोल पड़ी- मैं देवर्षि की चुनौती स्वीकार करती हूं. कुशलतापूर्वक दुर्वासा ऋषि का तप भंग कर सकती हूं, मुझे देवराज इसकी आज्ञा दें.

वपु का दृढ़ निश्चय देख इंद्र ने प्रसन्न होकर कहा- हे मदवती यदि तुम दुर्वासा ऋषि के असाधारण तप में विघ्न उत्पन्न कर उन्हें अपने अपने रूपजाल में मोह सकी तो मैं अमरावती में तुम्हें मुंहमांगा पद, धन-संपत्ति सब अर्पित करूंगा.

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वपु दुर्वासाजी को मोहित करने चल पड़ी.

दुर्वासाजी पर्वत पर आश्रम बनाकर केवल वायु का सेवन करते हुए घोर तप में लीन थे. वपु ने दुर्वासा के आश्रम के एक कोस की दूरी पर डेरा डाला और प्रतिदिन उस वन में विहार करते मधुर संगीत का अलाप करने लगी. वह इतने सुंदर गीत-संगीत का प्रदर्शन करती कि आकाश से उड़ने वाले पक्षी वहां ठहर जाते. वन के सारे जीव उसकी ओर भागने लगते.

उसके संगीत के माधुर्य पर दुर्वासा भी मुग्ध हो गए और तप को बीच में छोड़कर उसकी ओर खींचे चले गए. बाद में दुर्वासा को आभास हुआ कि उन्होंने क्या अपराध कर दिया है. अपनी शक्तियों से वह सब जान गए और तपोभंग करनेवाली देवकन्या पर क्रुद्ध होकर श्राप दिया- हे देवकन्ये तुम मेरी तपस्या में विघ्न डालने के षड्यंत्र से यहां पर आई हो. इसलिए तुम गरुड़ कुल में पक्षी बनकर जन्म धारण करोगी.

शापित अप्सरा वपु विलाप करने लगी. वह बार-बार दुर्वासा से क्षमायाचना कर रही थी. दुर्वासा को भी लगा कि सारा दोष उसका नहीं है. वह पसीज गए. वपु पर दया करते हुए दुर्वासा ने शाप में थोड़ा संशोधन कर दिया.

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