स्वर्ण नहीं खरीदा तो तृतीया अधूरी रही, ऐसा न सोचें. श्रीकृष्ण की तरह मित्र-अतिथि का मान करें. एक संदर्भ और है. आज के ही दिन श्रीकृष्ण ने पांडवों को अक्षय पात्र प्रदान किया था.राजा यदि वन में भी है तो उसे अतिथियों की सेवा करनी होती है.

श्रीकृष्ण पांडवों को धर्मयुद्ध के लिए तैयार कर रहे थे. वह उन्हें शक्ति अर्जित करने के स्थान पर अतिथियों का पेट भरने के लिए खेती करते कैसे देते भला! सो उन्होंने अपना और आगंतुको का पेट भरने के लिए पांडवों को अक्षय पात्र दिया था जिससे जरूरतभर अन्न निकाला जा सकता था. स्वर्ण नहीं निकलता था उससे. अर्थात सोना खरीदने की होड़ में न पड़कर परोपकार करें वही अक्षय संपदा है.

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