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श्रीकृष्ण ने क्यों काट लिया था भीम के पौत्र का शीश?

श्रीकृष्ण ने क्यों काट लिया था भीम के पौत्र का शीश?

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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आपने महाभारत से जुड़ी एक कथा जरूर सुनी होगी कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के आरंभ होने से पहले ही एक ऐसे तेजस्वी बालक का शीशदान में मांग लिया जो अकेला ही युद्ध का निर्णय कर देने में सक्षम था.

महाभारत सीरियल भी आपने अगर देखा हो तो कुरुक्षेत्र की रणभूमि में चल रहे युद्ध के दौरान बीच-बीच में एक शीश युद्ध में तब-तब अट्टाहास करता दिख जाता था जब-जब महान योद्धा अनीति से किसी वीर का वध करते थे.

अट्टाहास करता वह शीश स्मरण कराता था कि यह कैसा धर्मयुद्ध? जहां योद्धा धर्म का त्यागकर अधर्म पर उतारू हैं. वह शीश कोई साधारण शीश नहीं था.

वह महान शीश था मोरवीनंदन वीर बर्बरीकजी का जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने कलियुग में पूजनीय होने का वरदान दिया. आज वह श्रीश्याम बाबा के नाम से पूजे जाते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं.

श्रीश्याम बाबा की यह कथा तो आप जानते हैं पर आज आपको हम श्याम बाबा की वह कथा सुनाते हैं जो आपने न सुनी होगी. उन्होंने क्यों धरती पर अवतार लिया और भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान क्यों मांगा.

भगवान श्रीकृष्ण ने भीम के पौत्र बर्बरीक का शीश दान में मांग लिया. बर्बरीक सिद्ध अंबिकाओँ के भक्त थे और घोर तप से उन्हें प्रसन्न किया था.

जब सिद्ध अंबिकाओं ने सुना की भगवान ने उनके भक्त से शीश मांग लिया है और बर्बरीक की माता मोरवी समेत सभी पांडव शोक में डूबे हुए हैं तो वे वहां प्रकट हुईं.

सिद्ध अंबिकाओं ने वीर बर्बरीक के शोकसंतप्त परिजनों को सांत्वना देते हुए बर्बरीक के पूर्वजन्म की कथा सुनानी शुरू की.

मूर दैत्य का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत ज्यादा बढ़ गया था. मूर के पास अपिरिमित मायावी शक्तियां थींं. उन शक्तियों का प्रयोग कर वह जीवों को पीड़ित करता और लुप्त हो जाता.

ऋषियों के यज्ञ-हवन आदि में विघ्न डालकर वह बड़ा आनंदित होता. यज्ञ के लोप होने से पृथ्वी पर आसुरी शक्तियां बलिष्ठ होने लगीं, इससे देवी पृथ्वी बहुत दुखी थीं.

पीडित पृथ्वी देवसभा में गाय के रूप में अपनी फरियाद लेकर पहुंची.

पृथ्वी ने देवताओं के समक्ष अपनी करूण प्रार्थना रखी- हे देवगण! मैं सभी प्रकार का संताप सहन करने में सक्षम हूँ. पहाड़, नदी एवं समस्त मानवजाति का भार सहर्ष सहन करती हुई अपनी दैनिक क्रियाओं का संचालन करती रहती हूं पर मूर दैत्य के अत्याचारों से मैं व्यथित हूँ. इस दुराचारी से मेरी रक्षा करो, मैं आपकी शरणागत हूँ.गौस्वरुपा धरा की करूण पुकार सुनकर सारी देवसभा में सन्नाटा छा गया.

थोड़ी देर के मौन के पश्चात ब्रह्माजी ने कहा-“ मूर दैत्य के अत्याचारों से रक्षा के लिए हमें भगवान श्रीविष्णु की शरण में चलना चाहिए और पृथ्वी के संकट निवारण हेतु प्रार्थना करनी चाहिए.”

उस देवसभा में यक्षराज सूर्यवर्चा भी थे. उनसे एक धृष्टता हो गई. उन्होंने ब्रह्माजी की बात काटने का दुःसाहस कर दिया.

सूर्यवर्चा ने ओजस्वी वाणी में कहा- हे देवगण! मूर दैत्य इतना प्रतापी नहीं जिसका संहार केवल श्रीविष्णुजी ही कर सकें. हर बात के लिए हमें उन्हें कष्ट नहीं देना चाहिए. आप लोग यदि मुझे आज्ञा दें तो मैं स्वयं अकेला ही उसका वध कर सकता हूँ.

सूर्यवर्चा की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले- नादान! मैं तेरा पराक्रम जानता हूं. तुमने अभिमानवश इस देवसभा को चुनौती दी है. स्वयं को विष्णुजी के बराबर समझने की भूल करने वाले अज्ञानी! तुम इस देवसभा के योग्य नहीं हो. तुम अभी पृथ्वी पर जा गिरो. राक्षसकुल में जन्म लो.

ब्रह्माजी का क्रोध इतने पर शांत न हुआ. उन्होंने कहा- युद्ध के लिए आतुर यक्ष! पृथ्वी पर एक धर्मयुद्ध के आरंभ के ठीक पहले स्वयं भगवान विष्णु तुम्हारा सिर काटेंगे. राक्षस रूप में तुम उस युद्ध से वंचित रह जाओगे.

सूर्यवर्चा ब्रह्माजी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा. ब्रह्माजी का क्रोध शांत हुआ.

वह बोले- “वत्स! तूने अभिमानवश देवसभा का अपमान किया है, इसलिए मैं शाप वापस नहीं ले सकता लेकिन इसमें कुछ संसोधन अवश्य कर सकता हूँ.ब्रह्माजी ने शाप में संशोधन करते हुए कहा- भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से तुम्हारा शीश काटेंगे. उसके बाद देवियां तुम्हारे शीश का अमृत से अभिसिंचन करेगी. जिससे तुम देवताओं के समान पूज्य हो जाओगे. इस तरह से मेरा यह शाप तुम्हारे लिए वरदान हो जाएगा.

उसके बाद भगवान श्रीहरि ने भी इस प्रकार यक्षराज सूर्यवर्चा से कहा- हे वीर! तुम्हारे शीश की पूजा होगी और मेरे आशीर्वाद से तुम देवरूप में पूजित होगे.

अभिशाप को वरदान में बदलता देख सूर्यवर्चा प्रसन्न मन से उस देवसभा से अदृश्य हो गए. भगवान विष्णु ने पृथ्वी के उद्धार के लिए श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर मूर दैत्य का वध किया और मुरारी कहलाए.

पिता के वध का समाचार पाकर मूर दैत्य की पुत्री कामकटंककटा अंबिका की बड़ी भक्त थी. देवी अंबिका ने उसपर प्रसन्न होकर उसे अपना अमोघ खेटक प्रदान किया था.

पिता के वध की सूचना मिलते ही मूर की पुत्री जिसे मोरवी भी कहा गया, अजेय अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित हो श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगी.

मोरवी ने देवी द्वारा प्रदान किए अपने अजेय खेटक (चंद्राकार तलवार) से भगवान के सारंग धनुष से निकलने वाले हर तीर के टुकड़े टुकड़े करना शुरू कर दिया.

दोनों में लंबे समय तक घोर संग्राम हुआ. अंबिका की भक्त और कृपापात्र होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण मोरवी का वध करना नहीं चाहते थे.पर मोरवी के हठ के आगे वह विवश हो गए और उनसे पास कोई रास्ता नहीं बचा तो उन्होंने सुदर्शन चक्र के प्रयोग से मोरवी का मस्तक काटने का निर्णय किया.

ज्योंहि श्रीकृष्ण ने अपना अमोघ सुदर्शन हाथ में लिया, उसी समय माता कामाख्या अपनी भक्त मोरवी के रक्षार्थ वहाँ उपस्थित हो गईं.

देवी ने मोरवी से कहा- जिस महारथी से तू संग्राम कर रही है यही भगवान श्रीकृष्ण तेरे ससुर होंगे. इनकी शरणागत होकर इच्छित वरदान मांग ले.

माता के आदेश पर मोरवी ने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए और शांत होकर श्रीकृष्ण भगवान को प्रणामकर आशीर्वाद लिया. श्रीकृष्ण की कृपा से ही मोरवी का विवाह भीमपुत्र घटोत्कच से हुआ.

उपस्थित लोगों को यह वृत्तान्त सुनाकर देवी चण्डिका ने पुनः कहा- मोरवीनंदन का उद्धार स्वयं भगवान ने किया है. इसलिए आपको शोक नहीं करना चाहिए.”

श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को रणभूमि में प्रकट हुई चौदह देवियों सिद्ध, अम्बिका, कपाली, तारा, भानेश्वरी, चर्चि, एकबीरा, भूताम्बिका, सिद्धि, त्रेपुरा, चंडी, योगेश्वरी, त्रिलोकी और जेत्रा द्वारा अमृत से सिंचित करवाकर उसे देवत्व प्रदान करके अजर अमर कर दिया.

नवीन जाग्रत शीश ने उन सबको प्रणाम किया और युद्ध देखने की अनुमति मांगी.श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया, “हे वत्स! जब तक यह पृथ्वी नक्षत्र सहित विद्यमान है. जब तक सूर्य-चन्द्रमा विद्यमान हैं, तुम तब तक पूजनीय रहोगे. तुम देवियों के स्थानों में देवियों समान विचरते रहोगे.

अपने भक्तगणों में कुलदेव समान मर्यादा पाओगे. कल्याणकारी रूप में तुम भक्तों के वात-पित्त-कफ जनित रोगों का नाश करोगे. पर्वत की चोटी पर विराजमान होकर युद्ध देखो.

वासुदेव श्रीकृष्ण के वरदान के बाद देवियां अन्तर्धान हो गईं.

बर्बरीक जी का शीश पर्वत की चोटी पर पहुंच गया एवं बर्बरीकजी के धड़ का शास्त्रीय विधि से अंतिम संस्कार कर दिया गया. श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से उनका शीश देवरूप में परिणत हो गया था.

कुरुक्षेत्र की रणभूमि से कुछ दूरी पर स्थित खाटूधाम में उनका शीशस्वरूप प्रकट हुआ. वही खाटूधाम है जहां श्रीश्याम बाबा के भक्त आकर उनके दर्शनकर आशीर्वाद लेते हैं और मोरवीनंदन श्याम बाबा उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं.

(स्कन्दपुराण के माहेश्वर खंड अंतर्गत द्वितीय उपखंड “कौमारिका खंड” की कथा)

संकलनः महावीर प्रसाद सर्राफ “टीकम”
संपादनः राजन प्रकाश

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