भक्त से मिलने को कब व्याकुल हो जाते हैं स्वयं भगवान
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।एक राजा सायंकाल में महल की छतपर टहल रहा था. अचानक उसकी दृष्टि महल के नीचे बाजार में घूमते हुए एक सन्त पर पड़ी. संत तो संत होते हैं, चाहे हाट बाजार में हों या मंदिर में अपनी धुन में खोए चलते हैं.
राजा ने महूसस किया वह संत बाजार में इस प्रकार आनंद में भरे चल रहे हैं जैसे वहां उनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं. न किसी के प्रति कोई राग दिखता है न द्वेष.
मानो उनकी दृष्टिमें संसार है ही नहीं. राजा अच्छे संस्कार वाले और भगवद्भक्त थे. संत की यह मस्ती इतनी भा गई कि तत्काल उनसे मिलने को व्याकुल हो गए.
उन्होंने सेवकों से कहा कि इन संत से मिलने में एक पल की देर भी उन्हें पीडित कर रही है. इन्हें तत्काल लेकर आओ.
सेवकों को कुछ न सूझा तो उन्होंने महल के ऊपर से ऊपरसे ही रस्सा लटका दिया और उन सन्त को उसमें फंसाकर ऊपर खींच लिया.
चंद मिनटों में ही संत राजा के सामने थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
राजा ने सेवकों द्वारा इस प्रकार लाए जाने के लिए सन्त से क्षमा मांगी. संत ने सहज भाव से क्षमा कर दिया और पूछा ऐसी क्या शीघ्रता आ पड़ी महाराज जो रस्सी में ही खिंचवा लिया!
राजा ने एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं अचानक ऐसा बेचैन हो गया कि आपको यह कष्ट हुआ.
संत मुस्कुराए और बोले- ऐसी व्याकुलता थी अर्थात कोई गूढ़ प्रश्न है. बताइए क्या प्रश्न है.
राजा ने कहा- प्रश्न यह है कि भगवान् शीघ्र कैसे मिलें, मुझे लगता है कि आप ही इसका उत्तर देकर मुझे संतुष्ट कर सकते हैं? कृपया मार्ग दिखाएं.
सन्त ने कहा‒‘राजन् ! इस प्रश्न का उत्तर तो तुम भली-भांति जानते ही हो, बस समझ नहीं पा रहे. दृष्टि बड़ी करके सोचो तुम्हें पलभर में उत्तर मिल जाएगा.
राजा ने कहा‒ यदि मैं सचमुच इस प्रश्न का उत्तर जान रहा होता तो मैं इतना व्याकुल क्यों होता और आपको ऐसा कष्ट कैसे देता. मैं व्यग्र हूं. आप संत हैं. सबको उचित राह बताते हैं.
मुझे भी मार्ग दिखाएं. मेरी बुद्धि के बंद दरवाजे खोलें और इसका उत्तर देकर मेरी जिज्ञासा शांत करें.
राजा एक प्रकार से गिड़गिड़ा रहा था और संत चुपचाप सुन रहे थे जैसे उन्हें उस पर दया ही न आ रही हो. फिर बोल पड़े सुनो अपने उलझन का उत्तर.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
सन्त बोले- सुनो, यदि मेरे मन में तुमसे मिलने का विचार आता तो कई अड़चनें आतीं और बहुत देर भी लगती. मैं आता, तुम्हारे दरबारियों को सूचित करता. वे तुम तक संदेश लेकर जाते.
तुम यदि फुर्सत में होते तो हम मिल पाते और कोई जरूरी नहीं था कि हमारा मिलना सम्भव भी होता या नहीं.
परंतु जब तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार इतना प्रबल रूप से आया तो सोचो कितनी देर लगी मिलने में?
तुमने मुझे अपने सामने प्रस्तुत कर देने के पूरे प्रयास किए. इसका परिणाम यह रहा कि घड़ी भर से भी समय में तुमने मुझे प्राप्त कर लिया.
हे राजन्! इसी प्रकार यदि भगवान् के मन में विचार आ जाए कि आज मैं भक्त से मिलकर आता हूं तो फिर उनके लिए इस कार्य में देर कितनी लगेगी.
वह तो पलक झपकने से भी कम समय में संसार के किसी कोने में उपस्थित हो सकते हैं. तो हम भगवान को खोजें उससे उचित नहीं कि भगवान ही हम खोजते आ जाएं.
राजा यह सुनकर विस्मय में पड़ गया. भगवान क्यों खोजने आने लगे मनुष्य को! ऐसा भी कहीं होता है भला! लगता है संत महाराज आज आपे में नहीं है. फिर भी राजा ने धैर्य नहीं छोड़ा और प्रश्न किया.
राजा ने पूछा- परंतु भगवान् के मन में हमसे मिलने का विचार आए तो कैसे आए और क्यों आए ?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
सन्त बोले- तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार कैसे आया?
राजाने कहा‒ जब मैंने देखा कि आप एक ही धुन में चले जा रहे हैं और सड़क, बाजार, दूकानें, मकान, मनुष्य आदि किसी की भी तरफ आपका ध्यान नहीं है, उसे देखकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि मेरे मन में आपसे तत्काल मिलने का विचार आया.
सन्त बोले- यही तो तरीका है भगवान को प्राप्त करने का. राजन्! ऐसे ही तुम एक ही धुन में भगवान् की तरफ लग जाओ, अन्य किसी की भी तरफ मत देखो, उनके बिना रह न सको, तो भगवान् के मन में तुमसे मिलने का विचार आ जायगा और वे तुरन्त मिल भी जायेंगे.
भगवान तो सुपात्रों के पास आकर स्वयं मिलने और उनसे सुख-दुख बांटने को बेचैन रहते हैं, इंसान उस योग्य बना ही नहीं पाता स्वयं को.
उस संत ने थोड़े शब्दों में सारी भक्ति-भाव का निचोड़ निकालकर रख दिया. जिसने सृष्टि बनाई वह क्या अकेलापन महसूस नहीं कर लेगा जब इसी सृष्टि को भोलने वाला कोई ऐसा न मिले जो उनसे उनकी रचना की चर्चा कर सके.
आप कोई घर बनाते हैं तो उसे देखने वालों, उसमें रहने वालों सभी से घर बनाने में आई बाधाओं से लेकर उसकी सुंदरता तक की छोटी-बड़ी बात की चर्चा कितने प्रेम से करते हैं. क्या भगवान की यह इच्छा नहीं होती होगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
उन्हें भी तो इस सृष्टि में से ही साथी चाहिए जिनके साथ अपने हृदय की बात कह सुन सकें. पर ईश्वर तो यह बात उसी से करेंगे जो इसके योग्य स्वयं को बनाए.
भगवान स्वयं आपसे मिलने को व्याकुल हो जाएंगे आप स्वयं को उस योग्य बनाकर तो देखिए. भगवान में अहं जैसी कोई चीज है ही नहीं. उस मैल में तो इंसान लोटता है और इतराता भी है.
भक्त अपने कर्मों से उन्हें स्वयं आने को विवश कर सकता है. सच्चे भक्त यह कहने के अधिकारी हो जाते हैं कि हर बार हम ही क्यों जाएं, इस बार क्यों न प्रभु ही हमसे मिलने आएं और प्रभु आते भी हैं. उदाहरण भरे पड़े हैं.
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