पति को वश में कैसे रखा जा सकता है, जादू-टोने से, तंत्र मंत्र से या किसी और विधि से? सत्यभामा ने द्रौपदी से पूछे पति को वश में रखने के सूत्र
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंपत्नी, पति को ही नहीं आपसी कुटुंबियों को भी जाने समझें, कोई दुराव छिपाव न रखे, परिवार की करे सेवा और प्रबंध तो हमेशा बना रहेगा पति प्रेम. पांच पतियों के साथ सुंदर सामंजस्य बनाने वाली पांचाली ने बताए थे सुखद पारिवारिक जीवन के सुंदर राज.
बात तब की है जब पांडव वनवास झेलते हुए काम्यक वन में छिपे हुये थे. भगवान श्रीकृष्ण को सब पता था. एक दिन श्रीकृष्णजी सात्यिकी और अपनी पटरानी सत्यभामा इत्यादि को लेकर पांड़वों से मिलने जंगल पहुंचे और कुछ दिन उनके साथ रहे.
सत्यभामा ने यह देखा कि द्रौपदी के पांचों पति उसे समान प्यार और सम्मान देते हैं. इस बात पर चकित सत्यभामा ने द्रौपदी को एकांत में ले जाकर पूछा- तुम पांच अलग-अलग मिजाज के तेजस्वी और वीर पतियों को प्रसन्न कैसे रखती हो?सत्यभामा ने कहा- हे द्रौपदी! वे किसी और को नहीं बस तुम्हारा मुख देखते हैं. तुम्हारे वश में रहते हैं. आखिर इसका रहस्य क्या है? तुम्हारा स्थिर यौवन, कोई व्रत-उपवास, स्नान-ध्यान, जप-तप, जादू, जंतर- मंतर या कोई अन्य उपाय? मुझे भी बताओ जिससे मैं द्वारकाधीश को अपने वश में कर सकूं.
द्रौपदी ने कहा- आपने जो बातें कहीं हैं वे जतन तो कुटिल स्वभाव की स्त्रियां करती हैं. आप के लिए यह प्रश्न उचित नहीं. तंत्र-मंत्र, वशीकरण और इसी तरह के दूसरे उपायों से पति को स्त्री अपने वश में रख ही नहीं सकती.
पति को काबू करने के लिए तंत्र-मंत्र, का सहारा लेने वाली पत्नियों से पुरुष ऐसे ही डरता है जैसे घर में रहने वाले सांप से. इसका प्रयोग करने वाली स्त्री के प्रति वह हमेशा के लिए शंका और चिंता से भर जाता है. इससे दूरी बढती है.
मूर्खतावश तंत्र-मंत्र , जादू-जड़ी वाले धूर्तों के चक्कर में औरतें पतियों को ऐसी चीजें खिला देती हैं कि वे जलोदर, कोढ, पागलपन, बहरेपन और नपुंसकता जैसी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. पांडव जिन कारणों से मुझ पर प्रसन्न हैं, वह मैं संक्षेप में बताती हूं.मेरी पूजनीया सास ने मुझे घर परिवार, पति के लिए जो कर्तव्य बताये हैं मैं उनके पालन से कभी नहीं डिगती. अपनी सास की बुराई कभी नहीं करती हूं. अपने पतियों को कभी हीनभाव से नहीं देखती और भोजन वस्त्र आदि में शिकायत का प्रयास नहीं करती.
सत्यभामा, न तो कभी उनसे कठोर वचन बोलती हूं न उन पर संदेह करती हूं. जब कभी विवाद का मौका आता है तो मैं उसे टाल जाती हूं. पति बाहर चले जाते हैं तो न तो मैं बुरी संगत में बैठती हूं न ही अतिरिक्त श्रृंगार वगैरह करती हूं.
मैं अपने पति के सभी कुटुंबियों को जानती पहचानती हूं. परिवार के परिचितों से लेकर पुरखों तक, सबके बारे में मैंने गहराई से जाना है. सभी रिश्तों का पूरा ख्याल रखती हूं और उचित व्यवहार और कर्तव्य निभाती हूं.
देवपूजा, पर्व, श्राद्ध इत्यादि के खास भोजन, पकवान बनाने जैसे अवसरों का और अपने माननीयों की पूजा का मुझे हमेशा ध्यान रहता है. अनाज और दूसरी वस्तुओं की भंडार में क्या स्थिति है मुझे हर समय पता रहता है.पति की सेवा का मौका चूकती नहीं. समय पर भोजन देती हूं. उनसे पहले जगती और बाद में सोती हूं. उनके बाद ही स्नान भोजन करती हूं. पतियों के सामने हमेशा सुंदर,साफ कपड़े पहन तैयार होकर जाती हूं और उनकी पसंद भांप कर उसके मन मुताबिक ही करती हूं.
महाराज युधिष्ठिर के यहां एक लाख दासियां थीं. मैं सबको नाम, काम, और चेहरे से पहचानती थी. महाराज की सवारी में कितने हाथी घोड़े हैं और अस्तबल में कितने सबकी गिनती मुझे पता थी. पूरे अंत:पुर, सेवकों, पशु, पशुपालकों और अतिथियों का प्रबंध मैं ही किया करती थी.
राज्य के खजाने में कितना आया कितना गया यह मेरी नजर में होता था. रोज आठ हजार ब्राह्मण, दस हजार ब्रह्मचारी साधुओं, अठासी हजार स्नातकों को खिलाना, उनको अन्न, वस्त्र इत्यादि का दान दिलवाना मैं ही संभालती थी.
अपनी भूख प्यास और भूलकर पति ,सास और परिवार की सेवा में लगातार लगे रहने और अपने पतियों को तमाम कामकाज से इस तरह निश्चिंत कर देना कि वे आराम से अपने कामकाज और धर्म-कर्म में प्रसन्न मन से लगे रह सकें, यही मेरा पतियों के वश में करने का उपाय हैं.
स्त्री को अपने स्वभाव से पति का हृदय जीत लेना चाहिए. पति को यह आभास होने लगे कि वह अपनी पत्नी के बिना एक पग भी सरलता से नहीं चल सकता, उसकी पत्नी उसे स्वयं से भी ज्यादा अच्छे से समझती है, ऐसे पुरुष पत्नियों के वश में हो जाते हैं. (स्रोत: महाभारत वनपर्व)
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