एक स्त्री के लिए लड़ गए गुरू-शिष्य, ब्रह्मा न करते बीच-बचाव तो हो जाता सृष्टि का नाश- बुध ग्रह की जन्मकथा
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंयह कथा ग्रहों की प्रवृति और उनका हमारे ऊपर पड़ने वाले प्रभाव को समझने में सहायक होती है. ज्योतिष विज्ञान ग्रहों के इस भाव और कुंडली में उन ग्रहों की स्थिति से जातक के स्वभाव का अध्ययन कर लेता है.
देवगुरु बृहस्पति से चंद्रमा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. बृहस्पति की पत्नी तारा चंद्रमा की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे प्रेम करने लगी. रसिक मिजाज चंद्रमा भी तारा पर मुग्ध हो गए.
तब स्त्री को अपने पसंद से अपना जीवनसंगी चुनने की स्वतंत्रता थी. तो तारा चंद्रमा के साथ ही रहने चली गई. बृहस्पति इससे बहुत नाराज हुए. उन्होंने चंद्रमा से अपनी पत्नी लौटाने को कहा.
परंतु न तो चंद्रमा तारा को लौटाने को राजी हुए और न ही तारा वापस जाना चाहती थीं. बृहस्पति का तर्क था कि चूंकि तारा गुरुपत्नी हैं इसलिए उन्हें इस निर्णय की स्वतंत्रता इसलिए नहीं है. दोनों अपने-अपने तर्कों पर अड़े थे.
इस बात पर बृहस्पति और चंद्र के बीच युद्ध शुरू हो गया. दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य और बृहस्पति में बचपन से ही बैर था. इसलिए शुक्र चंद्रमा के साथ हो गए. शुक्र आए तो असुर सेना चंद्रमा के साथ आ गई. दक्ष चंद्रमा के ससुर थे. वह भी सहायता को आ गए.असुरों के चंद्रमा के साथ हो जाने से देवताओं ने युद्ध में अपने गुरू बृहस्पति का साथ दिया. चंद्रमा का पलड़ा भारी हो रहा था. बृहस्पति के पिता ने सहायता की. बृहस्पति के पिता अंगीरस शिवजी के विद्यागुरु थे. वह अपने गुरुपुत्र के पक्ष में युद्ध के लिए गणों के साथ आ गए.
बड़ी विचित्र स्थिति बनी. दक्ष एक दामाद चंद्रमा की सहायता कर रहे थे तो दूसरे दामाद शिवजी की सेना विपक्ष में बृहस्पति की सहायता के लिए खड़ी थी. गुरु शिष्य के बीच एक स्त्री को लेकर शुरू हुए झगड़े से देवासुर संग्राम की स्थिति आ गई.
ब्रह्मा को भय हुआ कि इस युद्ध के कारण कहीं सृष्टि का ही अंत न हो जाए. वह बीच-बचाव कर युद्ध रुकवाने की कोशिश करने लगे. ब्रह्माजी तारा के पास गए और समझाया कि उसके प्रेम संबंध के कारण संसार खतरे में है.
ब्रह्माजी ने तारा को दोनों पक्षों में खड़ी सेनाएं और उनके युद्ध से संभावित विनाश की झलक दिखाई तो तारा भी भयभीत हो गईं. वह बृहस्पति के पास चले जाने को मान गईं.
तारा चंद्रमा को छोड़ वापस बृहस्पति के पास आई तो संग्राम टला. समस्या यहीं खत्म नहीं होनी थी. लौटकर आने के कुछ दिनों बाद जब माहौल शांत हुआ तो तारा ने घोषणा कर दी कि वह पूर्ण गर्भवती हैं.बृहस्पति को पता चला तो वह पुनः बौखलाए फिर उन्होंने इस बात शांति से ही सुलझाने में भलाई समझी. उ्न्होंने तारा से तत्काल गर्भत्याग को कहा. तारा ने समयपूर्व गर्भत्याग कर दिया. उससे एक बालक का जन्म हुआ.
वह बालक बहुत तेजस्वी और सौंदर्य में कामदेव जैसा था. बालक को देख चंद्रमा और बृहस्पति दोनों उस बालक को प्राप्त करने की लालसा जागी. दोनों ने उस पर दावा कर दिया.
एक बार फिर बृहस्पति और चंद्रमा में ठन गई. ब्रह्मा बीच-बचाव को आए. उन्होंने तारा से पूछा कि यह बालक किसका है लेकिन तारा ने कोई उत्तर नहीं दिया. आखिरकार अपने पिता के आदेश पर बृहस्पति उस बालक को चंद्रमा को देने को तैयार हो गए.
बालक का नाम रखा गया बुध. चंद्रमा ने बालक बुध को अपनी पत्नियों रोहिणी और कृत्तिका को पालन-पोषण के लिए सौंप दिया. बड़े होने पर बुध को अपने जन्म की कथा सुनकर ग्लानि होने लगी.
उसने माता से पूछा कि वह किसका पुत्र है तो माता ने चंद्रमा का नाम लिया. दुखी बुध हिमालय में श्रवणवन पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगे. तप से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने उसे दर्शन दिए.श्रीहरि ने वरदान मांगने को कहा तो बुध ने कहा कि अपने जन्म के संताप से मेरा हृदय जल रहा है. श्रीहरि ने उनका संताप हर लिया और सभी वैदिक विद्याएं एवं सभी कलाएं प्रदान कीं. बुध शांत विचार के हो गए इसलिए वह देवों को प्रिय हुए.
यही बुध सौरमंडल में सूर्य से सबसे समीप के ग्रह हैं. बुध वाक् कला यानी ओजस्वी वचन प्रदान करते हैं. बुद्धि के कारक ग्रह हैं एवं जातक के शरीर के दांत, गर्दन, कंधे और त्वचा पर इनका प्रभाव रहता है.
इस कथा में चंद्रमा का स्वभाव चंचलता वाला रहा है. इसलिए चंद्रमा चंचलता देता है. बृहस्पति ने हृद्य की विशालता दिखाई और उनकी समझदारी से ही युद्ध टला. बृहस्पति हमारे विवेक और सूझबूझ पर असर रखते हैं.
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