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सोमशर्मा ने दी ऐसी कौन सी पितृभक्ति की कठोर परीक्षा जो अगले जन्म में मिला भक्त प्रह्लाद होने का सौभाग्य

सोमशर्मा ने दी ऐसी कौन सी पितृभक्ति की कठोर परीक्षा जो अगले जन्म में मिला भक्त प्रह्लाद होने का सौभाग्य

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंपिछली कथा में आपने पढ़ा- पांच बेटों में से तीन तो अपनी पितृप्रेम की परीक्षा में पास हो गए. चौथे बेटे विष्णु को कहा- स्वर्ग से अमृत कलश लाओ, मुझे पिलाओ. विष्णु अमृत कलश हासिल करने गया तो इंद्र ने बड़ा परेशान किया. पिछली कथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

आखिरकार विष्णु शर्मा को गुस्सा आ गया और जब वह अपने तप बल का प्रयोग कर इंद्र को उनके पद से उतारने की तैयारी कर बैठे तो इंद्र खुद अपने हाथों विष्णुशर्मा को अमृत कलश सौंपने आए. इंद्र से अमृत भरा घड़ा लेकर विष्णु ने अपने पिता को दे दिया.

शिवशर्मा अमृत पाकर बहुत खुश हुए. सभी बेटों को बुलाया और बोले- तुम सब की पितृभक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं. तुम लोग कोई वरदान मांगना चाहते हो तो मांग लो.

बेटों ने एक स्वर से कहा- हमारी मां को जीवित कर दीजिए. शिवशर्मा ने फिर अपनी सिद्धि का सहारा लिया और मां जीवित होकर बेटों के बीच खड़ी हो गईं.

शिवशर्मा ने पूछा- बेटों मैं तो तुम्हें आज स्वर्ग या अक्षयलोक तक दे सकता था तुमने वह क्यों नहीं मांगा? बेटों ने कहा- ठीक है आप अब वही वर दे दीजिए. शिवशर्मा ने कहा- ऐसा ही हो. इतना कहना था कि रोशनी बिखेरता अक्षयलोक का दिव्य विमान उतर आया.विमान में से भगवान के सेवक उतरे और सबको बैठकर विष्णुलोक चलने को कहा. शिवशर्मा ने कहा- मैं, मेरा बेटा सोम और पत्नी अभी विष्णुलोक नहीं जायेंगे. आप इन चार बेटों को ही विष्णु धाम दें.

विमान चारों बेटों यज्ञ, विष्णु, धर्म, और वेद को लेकर विष्णुलोक चला गया. शिवशर्मा ने चारों बेटों को विष्णुलोक भेज दिया लेकिन अभी सोम की परीक्षा तो उन्होंने ली ही नहीं थी.

एक दिन उन्होंने सोम से कहा- सोम मैं तुमको एक कठिन काम सौंपना चाहता हूं. हम दोनों कल ही तीर्थ यात्रा पर निकल रहे हैं. हमें लौटने में समय लगेगा. घर में अमृत जैसी कीमती चीज रखी है तुम्हें इसकी जी जान से रक्षा करनी होगी.

अपने पिता से आदेश पाकर सोम बहुत खुश हुआ. वह अमृत की रखवाली करने लगा. दस साल बाद सोम के माता-पिता तीर्थयात्रा से लौटे. उनके पूरे शरीर में कोढ फूट गया था.

कई अंग गलने के करीब थे. वे किसी तरह चल फिर सकने वाले मांस का पिंड भर रह गये थे जिन्हें देखते ही घिन्न आती थी. सोम यह देख अचरज से पूछ बैठा- आप तो साक्षात विष्णु के समान हैं, आप को यह अधम बीमारी कैसे लग सकती है?यह सब शिव शर्मा की फैलायी माया थी. पर शिवशर्मा ने कहा- बेटा हो सकता है पिछले जन्म का कोई पाप इस जन्म में उभर आया हो. अब तो इसे झेलना ही है. सोम मन से माता पिता की सेवा में लगा रहता.

वह उनका मल मूत्र, मवाद धोता, दवा देता, खिलाता, पिलाता, सुलाता. उलटे शिव शर्मा उसे डांटते, फटकारते और मारते ही रहते. शिवशर्मा ने सोचा कि कठोर व्यवहार के बाद भी यह न कभी नाराज होता है न शिकायत करता है.बस सेवा में लगा रहता है.

इस परीक्षा में यह पास तो है पर इसकी एक आखिरी परीक्षा और लेकर देखा जाए. शिवशर्मा ने सोम से कहा- तुम्हारी रखवाली में हम अमृत कलश छोड़ गए थे. इस बीमारी से मुक्ति पाने का अब बस वही एक रास्ता है. अमृत कलश में से अमृत पिलाओ.

यह आदेश देने से पहले शिवशर्मा ने माया का प्रयोग रके अमृत को चुरा लिया था. सोम जब अमृत लेने गया तो कलश खाली था. वह बड़ा चिंतित और दुःखी हुआ कि आखिर मेरी रखवाली में रखे इस कलश से अमृत ले कौन गया?

उसने आंखें बंदकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की- भगवन अगर मेरी तपस्या सच्ची है तो यह अमृत कलश पहले की तरह भर जाए. सोम ने आंखें खोलीं तो अमृत का कलश लबालब भरा हुआ था.सोम ने अमृत कलश लिया और मां पिता के पास पहुंच कर उनके चरणों में प्रणाम किया फिर अमृत पीने का आग्रह किया. पर वे तो बिना अमृत पीए ही भले चंगे थे. उनकी तो समूची देह चमक रही थी.

सोम माता पिता को स्वस्थ देख खुश था. पिता अपने बेटे की पितृभक्ति देख प्रसन्न थे. शिवशर्मा ने सोम को अनगिनत आशीर्वाद दिए. उसी समय एक दिव्य विमान उतरा जो विष्णु लोक से आया था.

सोमशर्मा सहित उनके माता-पिता को बिठाकर विष्णुलोक को रवाना हो गया. सोमशर्मा की इस अद्भुत भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु भी बड़े प्रसन्न हुए. अगले जन्म में सोमशर्मा महान विष्णुभक्त प्रह्लाद हुए.(स्रोतः पद्म पुराण)

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यह प्रेरक कथा अशोक रघुवंशीजी के सौजन्य से WhatsApp के माध्यम से प्राप्त हुई. यदि आपके पास भी कोई प्रेरक कथा है तो हमें मेल से या WhatsApp से भेजें. कथा अप्रकाशित और एप्प की रूचि अऩुसार हुई तो उसे एप्प में स्थान देने का प्रयास करेंगे.

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