January 29, 2026

श्रीरामचरितमानस-बालकांडः को बड़ छोट कहत अपराधू, सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू

श्रीराम नाम महिमा

तुलसीदासजी श्रीराम के स्वरूप और नामजप की महिमा के बीच के अंतर को समझने में उलझे हैं. वह कहते हैं कि दोनों एक दूसरे के साथ हैं और दोनों की महिमा अपरंपार, फिर अंतर कैसे करें! संतजन दोनों में अंतर नहीं करते तो वह अपराध मैं कैसे करूं.

चौपाई :
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥1॥

भावार्थ:- समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है. अर्थात्‌ नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं.

प्रभु श्रीरामजी अपने ‘राम’ नाम का ही अनुगमन करते हैं. जो उनका नाम पुकारते हैं वह उनके लिए आ जाते हैं. नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं. भगवान के नाम और रूप दोनों वर्णन से बाहर, अनादि और सुंदर हैं. शुद्ध मन से भक्तियुक्त बुद्धि से समझने पर ही इनका दिव्य अविनाशी स्वरूप जानने में आता है.

को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥2॥

भावार्थ:-इन नाम और रूप में किसको छोटा और किसको बड़ा कहूं. दोनों की महिमा अपरंपार है. इसलिए मैं इस घोर अपराध से बचता हूं. नाम और रूप का रिश्ता समझकर साधु पुरुष स्वयं ही जान लेंगे. रूप नाम के अधीन है पर नाम के बिना रूप का ज्ञान भी नहीं हो सकता. इसलिए इस भेद में पड़ना व्यर्थ है.

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रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥3॥

भावार्थ:- कोई सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूप के बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाए तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है.

नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥4॥

भावार्थ:- नाम और रूप की विशेषता की कथा वर्णन से बाहर है. उसका आनंद तो लिया जा सकता है परन्तु वर्णन नहीं किया जा सकता. निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुंदर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाला चतुर दुभाषिया है.

दोहा :
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥21॥

भावार्थ:- तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों उजाला चाहता है, यानी मन और काया दोनों को उज्जवल निर्मल करना चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख.

श्रीराम का नाम की महिमा ऐसी है कि इसको भजने वाले राममय हो जाता है और उसके अंतःकरण और बाहरी काया दोनों का शुद्धिकरण हो जाता है. तन और मन दोनों निर्मल हो जाते हैं.

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