गणेश अवतारः मोह का नाश करने वाला है गणपति का महोदर अवतार, मोहदर मंत्र का स्मरण करें

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंदैत्यगुरु शुक्राचार्य का एक शिष्य था. जिसका नाम मोहासुर था. अपने गुरू के आदेश से मोहासुर ने भगवान सूर्य की कठोर तपस्या करके उनके समान पराक्रम और तेज का वरदान मांगने को कहा.
गुरू के निर्देश पर मोहासुर ने कठिन असाध्य तपस्या की. भगवान सूर्य प्रसन्न हो गए तथा मोहासुर को सर्वत्र विजय का वरदान दे दिया. वरदान प्राप्तकर मोहासुर अपने गुरु के पास चला गया.
शुक्राचार्य ने मोहासुर को दैत्यराज घोषित कर दिया और उसका राज्याभिषेक कर दिया. मोहासुर ने अपने छल-पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार प्राप्त कर लिया. इसके बाद वह अपनी पत्नी मदिरा के साथ सुखपूर्वक रहने लगा और विजय अभियान जारी रखा.
समस्त देवी, देवता, ऋषि, मुनि, सब मोहासुर के भय से इधर-उधर छुप गए. वर्णाश्रम, धर्म, सत्कर्म, यज्ञ, तप आदि सब नष्ट हो गए. मोहासुर तीनों लोकों पर राज करने लगा.
दुखी और हारे हुए देवी, देवता, ऋषि, मुनि, सब भगवान सूर्य के पास गए तथा इस भयानक विपत्ति से निकलने का उपाय पूंछा. भगवान सूर्य ने सभी देवी देवताओं को श्रीगणेश का एकाक्षरी मंत्र दिया और श्री गणेश को प्रसन्न करने की प्रेरणा दी.समस्त देवी देवता श्रीगणेश को पूर्ण भक्ति भाव से प्रसन्न करने के लिए उपासना करने लगे. उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान महोदर प्रकट हुए. देवताओं और मुनियों ने करूणापूर्वक महोदर की स्तुति की.
भगवान महोदर ने कहा कि मैं आततायी मोहासुर का वध करूंगा करके आपके कष्ट दूर करूंगा. आप निश्चिंत होकर जाएं. ऐसा कहकर मूषक पर सवार भगवान महोदर मोहासुर से युद्ध करने के लिए चल दिए.
यह समाचार देवर्षि नारद ने मोहासुर को दिया तथा अनंत पराक्रमी समर्थ महोदर का स्वरूप भी उसे समझाया. दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने भी उसे भगवान महोदर की शरण लेने का परामर्श दिया.
उसी समय भगवान महोदर का दूत बनकर भगवान विष्णु मोहासुर के पास गए. उन्होंने मोहसुर से कहा- तुम्हें अनन्त शक्ति- संपन्न भगवान महोदर से मित्रता कर लेनी चाहिए.यदि तुम महोदर की शरण-ग्रहण कर देवताओं, मुनियों तथा ब्राह्मणों को धर्मपूर्वक जीवन बीताने में व्यवधान न पैदा करने का वचन दो तो दयामय प्रभु तुम्हें क्षमा कर देंगे. यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो रणभूमि में तुम्हारी रक्षा असम्भव है.
मोहासुर का अहंकार नष्ट हो गया. उसने भगवान विष्णु से निवेदन किया. आप परम प्रभो भगवान महोदर को मेरे नगर में लाकर उनके दुर्लभ-दर्शन का अवसर प्रदान करें. भगवान महोदर ने नगर में पदार्पण किया.
मोहासुर ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया. दैत्य युवतियों ने पुष्पवर्षा की. मोहासुर ने भगवान महोदर की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विधि-विधान से पूजा-स्तुति की. वह भगवान की स्तुति करने लगा.
स्तुति करते हुए उसने कहा- हे प्रभो! अज्ञानवश मेरे द्वारा जो अपराध हुआ हो उसके लिए मुझे क्षमा करें. मैं आपके प्रत्येक आदेश का पालन करने का वचन देता हूं. अब मैं देवों मुनियों के निकट भूलकर भी नहीं जाऊंगा. किसी भी धर्मकार्य में विघ्न नहीं डालूंगा.सहज कृपालु भगवान महोदर मोहासुर की दीनतापर प्रसन्न हो गए. उसे अपनी भक्ति प्रदान कर दी. मोहासुर के शान्त होने से देवता, ऋषि, ब्राह्मण तथा धर्म-परायण स्त्री-पुरूष सभी सुखी हो गए. देवता और मुनि महाप्रभु महोदर की स्तुति एवं जय-जयकार करने लगे.
भगवान महोदर का मंत्र
महोदर इति ख्यातो ज्ञानब्रह्मप्रकाशकः ।
मोहासुरस्य शत्रुर्वे आखुवाहनगः स्मृतः ||
(अर्थ :-भगवान् श्री गणेश का महोदर अवतार ब्रह्म ज्ञान का प्रकाशक है, यह मोहासूर का वध करने वाला है तथा मूषक वाहन पर चलने वाला है)
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