शिवपुराणः एक शाप और मेना को मिला, पार्वतीजी की माता बनने का सौभाग्य
हम आपको शिवपुराण के सती खंड तक का प्रसंग ऐप्प में दे चुके हैं. आज पार्वती खंड का आरंभ करते हैं. शिवपुराण की कथाएं पढ़ने के लिए आप यहाँ क्लिक कर Mahadev Shiv Shambhu ऐप्प डाउनलोड कर लें.

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शिवपुराण ब्रह्माजी अपने पुत्र नारद को सुना रहे हैं.
नारदजी ने ब्रह्माजीसे पूछा- हे पिताश्री! आप मुझे सती के देहत्याग के बाद पार्वती के रूप में उनके फिर से अवतार की पूरी कथा सुनाएं. ब्रह्माजी ने नारद को कथा सुनानी आरंभ की.
उत्तर में पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान पर्वत हैं. हिम से आच्छादित रहने के कारण इन्हें हिमालय भी नाम पड़ा. हिमवान सौदर्य औऱ संपदा में सभी पर्वतों से श्रेष्ठ थे. भगवान शिव को ये अतिप्रिय थे और उन्होंने यहां ही निवास बना लिया था.
एक बार हिमवान को अपने कुल परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए विवाह की इच्छा हुई. हिमवान की इच्छा जानकर देवों ने पितरों से कहा कि वह अपनी मंगलरूपिणी पुत्री मेना का विवाह हिमवान से कर दें तो इससे हम देवों के दुखों के निवारण का मार्ग बनेगा.
देवों के अनुरोध पर पितरों ने मंत्रणा की और हिमवान से मेना का विवाह कर दिया. दक्ष की साठ कन्याओं में से एक थी स्वधा. स्वधा की तीन पुत्रियां थीं. मेना, धन्या व कलावती. मेना सबसे बड़ी थीं. ये तीनों पितरों के मन से उत्पन्न हुई थीं इसलिए मानस पुत्रियां थीं.
किसी स्त्री के गर्भ से उत्पन्न न होने के कारण ये तीनों अयोनिजा थीं. ये केवल लोकव्यवहार के लिए ही स्वधा की पुत्रियां कही जाती थीं. अन्यथा संपूर्ण जगत की वंदनीया माताएं थीं. एक बार तीनों बहनें विष्णुजी के दर्शन को विष्णुलोक पहुंची.श्रीहरि ने उन्हें कुछ दिन विष्णु लोक में ही रहने को कहा. इसी बीच मेरे मानस पुत्र सनकादि सिद्ध ऋषि आए. विष्णुजी के कहने पर वे भी विष्णुलोक में ही ठहर गए. सनकादि बालरूप में रहते हैं. परंतु सबके द्वारा वंदनीय हैं.
सनकादि को देखकर तीनों ने उनका अभिवादन तक न किया, प्रणाम तो बहुत दूर की बात है. उनका अपमान हुआ. शांत रहने वाले सनकादि दैवयोग से क्रुद्ध हो गए. उन्होंने तीनों बहनों को मानव स्त्रीरूप में पृथ्वी पर जाने का शाप दे दिया.
तीनों बहनों द्वारा क्षमा मांगने और अनुनय-विनय पर सनकादि ने शाप में संशोधन कर दिया. वे बोले- सबसे बड़ी बहन हिमालय की पत्नी बनकर एक कन्या को जन्म देगी. उससे स्वयं शिवजी विवाह करेंगे.
धन्या नामवाली मंझली बहन का विवाह राजा जनक से होगा. वह स्वयं महालक्ष्मी को जन्म देंगी जिससे श्रीहरि अवतार श्रीराम का विवाह होगा. तीसरी कलावती द्वापर के अंतिम भाग में वृषभानु से विवाह करके राधा नामक कन्या को जन्म देंगी जिसे श्रीकृष्ण वरण करेंगे.
ब्रह्माजी बोले- यह कहकर सनकादि ऋषि वहां से अंतर्धान हो गए. तीनों बहनेंजो शाप से दुखी थीं वे अब इठलाने लगीं कि प्रभु की माया से उन्हें कितना बड़ा गौरव प्राप्त होने वाला है. मेना से विवाह करके हिमवान सुख से रहने लगे.
एक दिन विष्णुजी के नेतृत्व में सभी देवता हिमवान के घऱ पहुंचे. हिमवान ने आवभगत करके आगमन का कारण पूछा. देवों ने कहा- गिरिराज दक्षकन्या सती कोई और नहीं स्वयं जगदंबा उमा ही थीं. आप सती को अपने घर में पुनः अवतार लेने की सहमति दें.यह बात सुनकर हिमवान तो प्रसन्नता से फूले न समाए. उन्होंने कहा कि देवकार्य में उनका कोई सहयोग तो इससे अच्छा क्या है. सभी देवता भगवती की एकस्वर से स्तुति करने लगे. हिमवान भी स्तुति कर रहे थे. प्रसन्न हो देवी ने दर्शन दिए.
देवों ने प्रार्थना की- हे मां आपने ब्रह्माजी के अऩुरोध पर दक्षपुत्री के रूप में अवतार लेकर हमारे कष्टों का नाश किया था. उसी प्रकार आप हिमवान के घर में जन्म लेकर हमारे कष्टों का अंत करें एवं सनकादि के दिए शाप को भी पूर्ण करें.
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! आप निश्चिंत होकर अपने लोक को लौट जाएं. मैंने जब देहत्याग किया तब से कामजयी होने के उपरांत भी मेरे नाथ को मेरा वियोग है. वह मुझसे यथाशीघ्र पुनर्मिलन चाहते हैं. अतः मैं मेना के गर्भ से अवतार लूंगी.
यह कहकर देवी अदृश्य हो गईं. ब्रह्माजी इतनी कथा सुनाने के बाद चुप हो गए. उनके मुख से इतनी कथा सुनने के बाद नारद की उत्सुकता बढ़ गई. उन्होंने आगे की कथा सुनाने की इच्छा कही.
ब्रह्माजी ने कहा- देवों ने गिरिराज और मेना को तपस्या करके देवी की आराधना का सुझाव दिया. पति-पत्नी दोनों ने सत्ताइस वर्षों तक देवी की अखंड साधना की. फिर देवी प्रसन्न हुईं और उन्होंने दर्शन दिए.
रूद्र संहिताः पार्वती खंड. कथा क्रमशः जारी रहेगी…
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संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्