उषा और अनिरूद्ध के विवाह में बलरामजी ने कर दिया श्रीकृष्ण के साले रूक्मि का वध- अंतिम भाग

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पहले के तीन भागों में आपने पढ़ा कि श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा को प्रेम हुआ. बाणासुर ने अनिरूद्ध को बंदी बना लिया तो श्रीकृष्ण चित्रलेखा ने अनिरुद्ध का अपहरण कर दोनों की शादी करा दी.
इस कारण बाणासुर और भगवान श्रीकृष्ण में युद्ध हुआ. बाणासुर को शिवजी ने उसकी रक्षा का वरदान दिया था. सो वह युद्ध में आए. श्रीकृष्ण के साथ उनका युद्ध भी हुआ.
अंततः शिवजी ने स्वयं श्रीकृष्ण को युद्ध से निकालने की राह बताई जिसका पालनकर श्रीकृष्ण ने बाणासुर को पराजित किया. पार्वतीजी के हस्तक्षेप से श्रीकृष्ण ने बाणासुर का वध नहीं किया. बाणासुर ने अनिरूद्ध और संध्या की विवाह की स्वीकृति दे दी. अब आगे.
विवाह का उत्सव निर्विघ्न समाप्त हो गया. लेकिन रूक्मी के मित्र कलिंगनरेश ने खलल डालने का षड़यंत्र किया और बलरामजी को चौसर के खेल के लिए चुनौती दे दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
रूक्मिणीहरण के दौरान श्रीकृष्ण से रूक्मी के प्राण बचाते हुए बलरामजी ने रुक्मी का आधा सिर मूंडकर, आधी मूंछ काटकर जीवनदान दे दिया था. इस अपमान को रूक्मी मृत्यु से बड़ा दंड मानता था.
बलरामजी को पासे डालने तो आते नहीं थे परन्तु उन्हें इस खेल में बड़ी रूचि थी. यह बात रूक्मी को भी पता थी. मित्र के बहकावे में रुक्मी ने बलरामजी को बुलवाया और उनसे जुआ खेलने को कहा.
श्रीकृष्ण ने जब देखा कि रूक्मी उन्हें खेलने के लिए ले जा रहा है तो उन्होंने रूक्मी को समझाया कि मंगल कार्यों में किसी को व्यसन के लिए प्रेरित न करें. इससे अमंगल हो सकता है.
रूक्मी के सिर पर तो काल सवार था. उसने प्रभु का सुझाव नहीं माना. उसने बलरामजी फिर से ललकारा तो बलरामजी तैश में आकर जुआ खेलने के लिए बैठ ही गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
हालांकि बलरामजी को कुछ आशंका तो हुई लेकिन चूंकि रूक्मी द्वारका में उनके अतिथि थे, ऊपर से उन्होंने चुनौती दी थी इसलिए वह आखिर मना कैसे करते.
रुक्मी और बलरामजी के बीच चौसर का खेल शुरू हुआ. बलरामजी सज्जन थे लेकिन कुसंग में पड़ गए. जुए के खेल में छल-कपट की भरमार रहती है लेकिन वह तो छल-कपट जानते नहीं थे, सो वह जल्दी हार भी गए.
रूक्मी तो बलरामजी के अपमान का अवसर तलाश ही रहा था. खेल में हारे बलरामजी पर वह तरह-तरह से आक्षेप करने लगा. भरी सभा में बलरामजी को अपमानित करने में उसने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ा.
रुक्मी ने कहा-बलरामजी! आखिर आप लोग वन-वन भटकने वाले ग्वाले ही तो ठहरे. आप पासा खेलना क्या जानें? पासों और बाणों से तो केवल राजा लोग ही खेला करते हैं, आप जैसे जंगल में भटकने वाले ग्वाले नहीं?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
रुक्मी ने आगे कहा- बलरामजी किस्मत से भले ही आप लोगों को राज-पाट मिल गया है लेकिन आप लोग इसके योग्य नहीं थे. आप तो गाएं ही चरा सकते हैं. राजपाट किसी क्षत्रिय को सौंपिए और गाय चराइए
रूक्मी तरह-तरह से आक्षेप करता जाता और वहां मौजूद राजा उसके इस तरह के उपहास पर जमकर ठहाके लगाते. बलरामजी अतिथि समझकर सब सहन कर रहे थे लेकिन उनका धैर्य जवाब दे गया.
बलराम ने एक मुद्गर उठाया और उस मांगलिक सभा में पीट-पीटकर रुक्मी को मार डाला. बलरामजी के इस प्रचंड क्रोध को देखकर अन्य राजा जान बचाकर प्रभु श्रीकृष्ण की शरण में प्राणरक्षा के लिए भागे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
विवाह के मंगल मौके पर हत्या हो गई थी. भगवान असमंजस में पड़ गए कि किसका साथ दें. मरने वाला उनकी पत्नी का भाई और मारने वाला उनका भाई. भगवान ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया.
श्रीकृष्ण ने कहा- मंगलमय उत्सव में व्यसनों को निमंत्रण देने से इस बात की आशंका थी कि किसी न किसी का अपमान होगा. मंगलकार्यों में अगर व्यसन होंगे तो वहां से मंगल विदा हो जाएगा और अमंगल का वास होगा.
बाणासुर श्रीकृष्ण से मिले जीवनदान के बाद और निरंकुश हो गया था. शिव-पार्वती की तो कृपा उस पर पहले से ही थी. बाणासुर का वध कैसे हुआ. उसका वध शक्ति की ही अंश एक कुँआरी देवी ने किया. इस पर कई प्रचलित कथाएं हैं.
दक्षिण भारत में उन्हें कन्याकुमारी कहा जाता है और उत्तर भारत में सूर्यवंशियों की आराध्य देवी बायण माता. यह कथा भी बहुत प्रचलित है. इसे भी सुना देंगें.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली