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लंका दहन कर क्यों पछताए हनुमान, क्यों छोड़ दिए दो महलः आज की रामकथा में लंका दहन प्रसंग

लंका दहन कर क्यों पछताए हनुमान, क्यों छोड़ दिए दो महलः आज की रामकथा में लंका दहन प्रसंग

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंहनुमान सीताजी को खोजते अशोक वाटिका पहुंचे. उन्होंने माता का कुशलक्षेम पूछा, स्वामी का संदेश दिया और माता की आज्ञा से वाटिका के फल खाए.

अब रामदूत आएं और शत्रु को आने का आभास न कराएं, उसके मन में प्रभु का भय न पैदा करें, ऐसा कैसे संभव था?

हनुमानजी ने वाटिका में इतना उत्पात मचाया कि रावण ने अपने परमवीर पुत्र अक्षय कुमार को हनुमानजी को पकड़ने भेजा.

अक्षय कुमार बजरंग बली के हाथों मारा गया. अक्षय जैसे वीर का वध एक वानर ने कर दिया, यह सोचकर रावण घबरा गया.

उसने इंद्रजीत को हनुमानजी को पकड़ने भेजा. इंद्रजीत को भी हनुमानजी ने नाकों चने चबवा दिए.

हारकर उसने पवनसुत पर ब्रह्मास्त्र चलाया. ब्रह्मास्त्र का मान रखने को हनुमान उसमें बंध गए.

उन्हें रावण के दरबार में लाया गया. एक झटके में ही उन्होंने खुद को ब्रह्मास्त्र से मुक्त कर लिया.

रावण ने इंद्रजीत को हनुमानजी का वध करने को कहा लेकिन विभीषण ने कहा कि दूत का वध करना पाप है. बौखलाए रावण ने उनकी पूंछ में आग लगाने की सजा दी.राक्षसों ने बजरंग बली की पूंछ में कपड़ा और तेल लपेटकर पूरी लंका में घुमाया. सीताजी को भी हनुमान के पूंछ में आग लगाने की सूचना मिली.

उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना की- अग्निदेव यदि में सच्ची पतिव्रता हूं तो आप मेरे पुत्र हनुमान को अपने तेज से पीड़ित मत कीजिएगा.

हनुमानजी ने पूरी लंका का निरीक्षण कर लिया उसके बाद घूम-घूमकर पूरी लंका जला दी.

माता की कृपा से पूंछ में आग लगने के बावजूद हनुमानजी की पूंछ नहीं जली. उन्होंने लंका में दो घर छोड़ दिए.

एक विभीषण का, क्योंकि वह रामभक्त थे. दूसरा कुंभकर्ण का. जब वह कुंभकर्ण के महल पहुंचे तो कुंभकर्ण गहरी नींद में सो रहा था.

उसकी पत्नी ने हनुमानजी से विनती की कि उसके पति गहरी निद्रा में सो रहे हैं. पति को प्राणदान दें और उसका महल न जलाएं.

उसने कहा कि सीताहरण में उसके पति की सहमति नहीं हैं क्योंकि वह तो सो रहे हैं. हनुमानजी ने उसका महल भी नहीं जलाया.

पवनसुत तसल्ली से पूरी लंका जला चुके तो पूंछ की आग बुझाने समुद्र में गए. आग बुझाते समय उन्हें अचानक बड़ा पछतावा हुआ.उन्हें आशंका हुई कि सारी लंका तो जला डाली, कहीं ऐसा तो नहीं कि उस आग में स्वयं माता सीता भी जल गई हों.

बजरंग बली के मन में भय हुआ कि जिसकी सूचना लेने आए थे, कहीं उसका अनिष्ट तो नहीं कर दिया.

उन्हें इस बात ध्यान ही न रहा कि जिसकी आज्ञा से अग्नि ने उनकी पूंछ न जलाई, वह भला स्वयं सीताजी को क्या जलाएंगे!

भोले-भाले बजरंग बली फिर चले माता की सुधि लेने. ख्याल यह भी आ रहा है कि सीताजी पर अग्नि का प्रभाव न होगा लेकिन मन मानता न था.

बजरंग बली धर्मसंकट में थे कि माता के सम्मुख जाएं भी तो जाएं कैसे? क्या बहाना बनाया जाए.

वह यह कैसे कहेंगे कि मैं यह देखने आया हूं कि आप तो लंका की आग में भस्म नहीं हुई. अग्नि श्रीराम से बैर मोलने की हिम्मत कर नहीं सकते.

इस धुन में खोए पवनसुत फिर से अशोक वाटिका पहुंचे और कहा कि आपसे आज्ञा लेने आया हूं.

माता तो अंतर्यामी ठहरीं. हनुमानजी को सकुशल देखकर वह बड़ी प्रसन्न हुईं और अग्नि का आभार व्यक्त किया.वह हनुमानजी को कुशल देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्होंने बजरंग बली को अमर होने का वरदान दे दिया.

फिर भी हनुमान वापस क्यों आए हैं वह यह समझ गईं थी. पर रामदूत उनके सहारे बने थे, इसलिए उन्हें झेंप हो ऐसा उचित नहीं.

इसलिए माता ने कहा- हनुमान आपने मेरे मन की बात समझ ली. मेरी इच्छा थी कि लंका से विदा होने से पहले आप एक बार और मिलें.

हनुमानजी बोले- माता मैं तो अभी आपको अपने साथ लेकर चल सकता हूं लेकिन जिसने प्रभु को पीड़ा दी है, उसे दंड भी प्रभु ही देंगे.

हनुमानजी ने आशीर्वाद लिया और उन्हें वचन दिया कि एक माह के भीतर वह प्रभु के साथ आकर रावण का नाशकर उन्हें ले जाएंगे.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

।।सियापति रामचंद्र की जय।। ।।पवनसुत हनुमान की जय।।

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