January 29, 2026

हार का दोषी कौन? भगवान, किस्मत या स्वयं इंसान

विरोचन और मुनि दरबारी गायक थे. विरोचन का पूरा दरबार कायल था. हर कोई उसे ही सुनना चाहता था. मुनि को यह बात अखरती थी. मुनि ने अपनी किस्मत मानते हुए समझौता कर लिया. अब दरबार में केवल विरोचन गाते. मुनि की प्रतिभा दबती चली गई.

मुनि ने अभ्यास भी छोड़ दिया.मंदिर में किस्मत और भगवान को कोसता रहता. एक दिन भगवान ने सोचा चलो इसकी भी सुन ली जाए. शिवजी प्रकट हो गए, पूछा-क्या चाहते हो?

मुनि बोले-मुझे भी विरोचन जैसा दरबार में गाने का मौका चाहिए ताकि मैं अपनी कला प्रदर्शित कर सकूं. कुछ दिनों बाद दरबार में दूसरे राजा और विद्वान आए. उनके मनोरंजन के लिए विरोचन को बुलाया गया पर विरोचन का गला खराब था.

राजा ने मुनि को बुलवाया. मुनि ने अभ्यास करना ही छोड़ दिया था इस कारण वह ठीक से गा नहीं पाया. राजा को गुस्सा आया. उसने मुनि को राजसभा में गाने से हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया.

दुखी मुनि मंदिर पहुंचा. शिवजी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे. मुनि ने शिकायत की- प्रभु यह क्या! इतनी प्रतीक्षा के बाद ऐसा मौका देने वाले थे. पहले बता देते तो मैं अभ्यास कर लेता. अब तो राह ही बंद हो गई.

शिवजी ने समझाया- मुनि, जीवन में कोई भी अवसर बताकर नहीं आता. कब किस्मत खुल जाए कहा नहीं जा सकता. हमेशा स्वयं को तैयार रखना चाहिए. तुमने आस और अभ्यास दोनों छोड़ दिया. अतः अपमानित होना पड़ा.

अपनी असफलता और परेशानी को भगवान या किस्मत पर न छोड़ें. किस्मत को कोसना और हार भगवान के मत्थे मढ़ना बेमानी है. हम कोशिश बंद कर देते हैं और फिर निष्क्रिय रहना स्वभाव बन जाता है. आस और प्रयास दोनों किसी हाल में न छोड़ें. किस्मत पुनः दस्तक देगी. उसके लिए खुद को तैयार रखिए
-सारिका शर्मा

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