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नल ने कहा कि वह 30 योजन तक की छलांग लगा सकते हैं. नील 50 योजन तक की छलांग लगाने में समर्थ थे. रीक्षराज जामवंतजी ने बताया कि वह 90 योजन तक की छलांग लगा सकते हैं.

अंगद ने कहा- मैं 100 योजन तक छलांग लगाकर समुद्र पार तो कर लूंगा, लेकिन लौट पाऊंगा कि नहीं, इसमें संशय है. बिना लौटे तो बात बनने वाली नहीं थी.

सब अपनी छलांग के सामर्थ्य पर बात कर रहे थे पर पवनपुत्र चुप रह गए. वह कुछ बोले ही नहीं. सबने उनकी ओर देखा.

जामवंतजी को याद आ गया कि हनुमानजी तो शापित हैं. उन्हें उनकी क्षमता तो तभी याद आएगी जब इसका स्मरण कराया जाए.

जामवंतजी बोले- का चुपि साध रहा बलवाना. हनुमानजी आप पवनसुत हैं. पवनदेव की गति से उड़़ सकते हैं. आपके लिए संसार में कुछ भी असंभ ही नहीं.

जामवंत हनुमानजी को उनके पराक्रम का स्मरण कराने लगे. जामवंत बोले- हनुमानजी आपने बचपन में छलांग लगाकर आकाश में स्थित सूर्य को पकड़ लिया था, फिर 100 योजन का समुद्र क्या है?

यह समुद्र तो आपके लिए बिलकुल वैसा ही जैसे कोई बालक अपनी कंदुक यानि गेंद को हवा में उछालने के बाद तपककर पकड़ ले. ऐसे अनेर समुद्र लांघ जाना आपके लिए बालसुलभ क्रीडा है.

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