January 29, 2026

श्रीरामचरितमानस-बालकांडः राम नाम सिव सुमिरन लागे, जानेउ सतीं जगतपति जागे

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सतीजी को अनुमान है कि महादेव अब सबकुछ जान चुके हैं. उनके मन में कई संताप हैं. महादेव के वचन पर संदेह क्यों किया, श्रीरामजी की परीक्षा क्यों ली, फिर स्वामी से असत्य क्यों कहा. मन में संताप हो तो तरह-तरह के विचार आते ही हैं. सती सोच रही हैं-

चौपाई :
नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥1॥

सतीजी के हृदय में नित्य नई बात आती है जिससे उनके मन का संताप बढता है. वह चिंतित है कि इस दुःख के सागर कब छुटकारा पाएंगी. मैंने श्रीरघुनाथजी का अपमान किया और फिर पति के वचनों को झूठ जाना.

सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥
अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥2॥

उसका फल विधाता ने मुझको दिया. जो हुआ वह उचित ही था, परन्तु हे विधाता! अब जो हो रहा है वह उचित नहीं है. महादेव से विमुख होने पर मेरे जीवन का कोई औचित्य नहीं है.

कहि न जाइ कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥
जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा॥3॥

सतीजी के हृदय की ग्लानि वर्णन से बाहर हो चली है. बुद्धिमती सतीजी ने मन में श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और कहा- हे प्रभो! आप दीनदयालु कहलाते हैं. वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुःख को हरने वाले हैं,

तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥
जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥4॥

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तो मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूं कि मेरी यह देह शीघ्र छूट जाए. यदि शिवजी के चरणों में मेरा प्रेम-अनुराग है और मेरा यह प्रेम का व्रत मन, वचन और कर्म तीनों से सत्य है

दोहा :
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥59॥

तो हे सर्वदर्शी प्रभो! विनती सुनिए और शीघ्र वह उपाय कीजिए, जिससे मेरा अंत हो और बिना परिश्रम के पति द्वारा परित्याग रूपी यह असह्य विपत्ति समाप्त हो जाए.

चौपाई :
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥1॥

दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता. सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिवजी ने समाधि खोली.

राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥2॥

शिवजी रामनाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि अब जगत के स्वामी शिवजी जागे. उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया. शिवजी ने उनको बैठने के लिए सामने आसन दिया.

सतीजी द्वारा सीताजी का रूप धरे जाने से महादेव ने उनका त्यागकर दिया. सती पत्नी हैं और सीता मातास्वरूप. पत्नी ने अज्ञानता में माता का रूप धरा तो फिर वह पत्नीसुलभ प्रेम के योग्य नहीं है. इस विचार से महादेव ने लंबी समाधि ले ली.

सतीजी का मन परित्यक्ता होने के भाव से ग्रसित होकर घोर संताप में जल रहा है. उन्होंने रघुनाथजी से महादेव से विरत शरीर से मुक्ति का मार्ग मांगा है. अर्थात अब स्वयं सतीजी भी अपने देह को व्यर्थ मान रही हैं. हरिइच्छा से देहमुक्ति का आधार बनना शुरू हुआ है.

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आगे की कथा कल…

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-राजन प्रकाश

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