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सुनते ही राजा और दोनों मंत्रियों को अपने सारे जन्म याद आ गये. वे अचेत होकर गिर पड़े. बेहोशी दूर हुयी तो राजा ने अपने बेटे को राजपाट सौंप दिया और जंगल चले गए.
वन में श्रीविष्णु का ध्यान करते हुए परमपद पा लिया. इस तरह तीनों चकवा भाई जो राह भटक गये थे फिर रास्ते पर आ वैरागी बन गये. यह सब उनके द्वारा एक जन्म में विधि विधान से किये गये श्राद्ध का ही सुफल था. (स्रोतः मत्स्य पुराण)
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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