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राजा ने पीछे देखा तो नदी तट पर दूर उनके सैनिक रेत उड़ाते आते दिखे. नदी तट पर बालू और रेत ही रेत थी. राजा ने सोचा, हो सकता है माता का पांव शंखिनी-डंकिनी नदी की रेत में फंस गया हो, इसी से आवाज न आयी हो.
राजा नदी तट से आगे बढा पर जब उसे नुपूर की कोई आवाज न सुनायी दी तो उसने वहीं समूची सेना को रोक दिया. रात में अन्नमदेव को लगा माता ने साक्षात दर्शन दिये पर वह स्वप्न था. माता ने कहा ‘अन्नमदेव तुमने नियम तोड़ा, पीछे मुड कर देखा, अब मैं जाती हूं. ‘
राजा अन्नमदेव माता के चरणों में लोट गये. बोले माता अब मैं युद्ध में विजय की कामना ले कर आगे बढुंगा ही नहीं पर आप मेरे साथ ही रहें. राजा के बहुत रोने धोने पर माता पसीज गयीं और वहीं पर अपना अंश स्थापित किया जबकि अन्नमदेव ने यहीं अपनी विजय यात्रा समाप्त कर दी.
डंकिनी-शंखनी के तट पर यहीं माता दंतेश्वरी का मंदिर बना. यह 52 शक्तिपीठों में से एक है. दंतेवाड़ा का नाम इस देवी के नाम पर पड़ा पौराणिक कहानियों के अनुसार यह वही जगह है जहाँ देवी सती का दांत गिरा था.
स्रोत: कथा इतिहास और किवदंतियां
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