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परशुराम गंधमादन की ओर चल पड़े. उन्हें पता चला कि दत्तात्रेय मां त्रिपुर सुंदरी के साधक हैं. उन्होंने सोचा मां त्रिपुर सुंदरी तंत्र और शक्ति की देवी हैं, मैं शक्ति साधक रहा हूं मुझे दत्तात्रेय से दीक्षा लेना बहुत बढिया रहेगा.
गंधमादन पर दत्तात्रेय मुनि का आश्रम बहुत विशाल और सुंदर था. परशुराम आश्रम पहुंचकर दत्तात्रेय मुनि की कुटिया के भीतर चले गये. वहां परशुराम ने देखा कि मुनि एक बेहद सुंदर युवती के साथ बैठे हैं और सामने ही मदिरा भरा बड़ा सा पात्र रखा है.
परशुराम ने सोचा, अरे यह मैं कहां आ गया, ऐसे गुरु से क्या कल्याण होगा. वे पीछे मुड़ने ही वाले थे कि हंसने के साथ किसी ने उन्हें पुकारा, आओ, आओ परशुराम, हिचको नहीं. तुम्हें संवर्त ने मेरे पास भेजा है न. कल्याण की लालसा से आये हो. आओ बैठो.
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