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राजा ने कुछ त्रिकालदर्शी ऋषियों से इस संदर्भ में पूछा. ऋषियों ने बताया कि वह पिछले जन्म में बकरी थी. बकरी के शरीर में वह स्तम्भ तीर्थ नामक स्थान पर एक झाड़ी में उलझकर मर गई थी.

जब वह मरी तो मुख को छोड़कर शेष देह खम्भार्क की खाड़ी में गिर गया था. उस पवित्र तीर्थ के प्रताप से वह दिव्य देहवाली कुमारी बन गई लेकिन गिरते समय उसका मुख वहीं झाडियों-लताओं में उलझा रह गया. इसीलिए उसका मुंह बकरी का ही रह गया.

राजर्षि ने ऐसा प्रबंध करा दिया कि कभी भी राजकुमारी के सामने कोई दर्पण न आए. कुमारी शीशे या जल में अपनी छाया न देख सके. पर जब किशोर उम्र में गई तो एक दिन उसने दर्पण में अपना मुख देख ही लिया.
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