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उस वन में देवी की माया से शिव के अतिरिक्त कोई और पुरुष प्रवेश नहीं करता था. यदि चूक से भी कोई पुरुष प्रवेश कर जाए तो वह देवी के शाप से स्त्री बन जाता था.

कई पुराणों में कहा गया है कि स्वयं महादेव भी देवी को प्रसन्न करने के लिए वहां आने पर स्त्रीरूप धारण कर लेते थे. शाप से सुदुयम्न स्त्री बनकर भटकने लगा.

वह इस स्वरूप से बहुत दुखी था. उसने शिव और पार्वती से बार-बार क्षमा मांगी और उसे पुरुष बनाने की विनती की. महादेव ने बताया कि यह अनायास नहीं हुआ.

उसके पिता द्वारा देवों पर दबाव बनाकर विधि के विधान से खिलवाड़ कर उसे स्त्री से पुरुष बनाने की चेष्टा का परिणाम है.

सुदम्य ने देवी पार्वती से कहा कि उसके माता-पिता के कार्यों के लिए उसे दंडित करना उचित नहीं है. देवी दयालु हो गईं.

पार्वती ने कहा शाप बदल नहीं सकता लेकिन यदि वह चाहे तो उसे एक ऐसा वरदान दे सकती हैं जिसके प्रभाव से वह एक महीने पुरुष और एक महीने स्त्री रूप में रह सकता है.

शिव ने वरदान दिया कि सुदुयम्न को पुरुष जीवन की बातें स्त्री रूप में स्त्री जीवन की बातें पुरुष रूप में याद नहीं रहेंगी ताकि उसे स्वयं पर लज्जा महसूस न हो.
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