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दिति गर्भवती हुईं. उन्हें कश्यप के शाप का स्मरण था. वह जानती थीं कि गर्भ में आई संतान अत्याचारी और नारायण के शत्रु होंगी.
यह सोचकर उन्होंने अपने तेज से पुत्रों को 100 वर्षों तक गर्भ से बाहर आने ही न दिया.
दिति द्वारा इतने समय तक गर्भ को रोकने से संसार में कई अनहोनी घटनाएं घटने लगीं. चारों ओर भयंकर अंधकार हो गया. देवगण ब्रह्मा की शरण में भागे.
अंततः ब्रह्माजी के समझाने बुझाने पर दिति ने अपनी संतानों को गर्भ से मुक्त किया. उनकी संतानें हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष हुए. एक का संहार करने के लिए भगवान ने नृसिंह अवतार तो दूसरे का वध करने के लिए वराह अवतार लिया.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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