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ब्रह्मा बोले- शिव और शिवा का वियोग हो ही नहीं सकता नारद. यह तो समझ का फेर है. संयोग-वियोग तो भोगियों के लिए हैं, योगियों के लिए कहां? उनके लिए दोनों स्थितियां एक सी हैं. शिव-शिवा के चरित्र को समझना इतना सरल नहीं है.
कही हई वाणी और उस वाणी के अर्थ को क्या अलग किया जा सकता है? दोनों का अस्तितत्व संयुक्त रूप से है और हमेशा रहेगा. वैसे ही दोनों शिव और शिवा का संयोग-वियोग उनकी इच्छा से और उनकी लीला स्वरूप ही होता है.
जो हुआ उसके पीछे भी महादेव की एक लीला थी. उन्हें पूर्व का एक कार्य पूरा करना था. शिवजी और उनके ससुर दक्ष के बीच एक विवाद हो गया था. दक्ष ने अज्ञानता में कुछ मूर्खताएं कर दी थीं.
मेरे द्वारा प्रजापति बनाए जाने से दक्ष गर्व में भर गया था. उसे अपनी उद्दंडता का दंड भुगतना ही था. शिव द्वारा शिवा का त्याग उसका ही परिणाम था. (शिव पुराण रूद्र संहिता, सती खंड-2) क्रमशः जारी….
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश