Lord-Maha-Rishi-Durvasa-Ji-With-Shakuntala (1)

अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
कुरुक्षेत्र तीर्थ में रहने वाले महर्षि मुद्गल दो तरीके से अपने लिए भोजन जुटाते थे एक तो भिक्षा मांगकर, दूसरे किसानों द्वारा काटी जा चुकी फसल से खेत में गिरे दाने चुनकर.

वे पखवारे भर में जो भी अन्न इकट्ठा करते अमावस्या या पूर्णिमा को दान कर देते. खुद पूरा परिवर तीन दिन में एक बार खाता पर इतना होने पर भी अतिथि उनके दरवाजे से कभी भूखा न जाता.

महर्षि मुद्गल के अन्नदान की महिमा दूर-दूर तक फैली तो उसे सुनकर क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात दुर्वासा ने उनकी परीक्षा लेने की सोची. दुर्वासा पागलों जैसा भेष बनाए मुद्गलजी के आश्रम में पहुंचे और भोजन मांगने लगे.

मुद्गल ने अपने पास रखा सारा अन्न दुर्वासा के सामने रख दिया. दुर्वासा ने सब खा लिया और वहां से चले गए. तीन तीन दिन पर एक बार खाने वाले मुद्गल परिवार सहित भूखे रह गए पर अपनी तकलीफ दुर्वासा को महसूस न होने दी.
शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here