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अपनी संतानों का चरित्र सुनकर अदिति विलाप करने लगीं. वह बार-बार कश्यप तथा त्रिदेवों से क्षमा मांगने लगीं. कश्यप का क्रोध भी पत्नी के विलाप को देखकर शांत होने लगा.

कश्यप बोले- मेरे लाख समझाने पर भी तुम नहीं मानीं, पापकर्म में मुझे भागीदार बनाया लेकिन तुम्हें पछतावा हुआ है इसलिए तुम्हारी संतानों का संहार स्वयं नारायण करेंगे.

दिति का मन शांत हुआ. वह बोलीं- मेरे लिए यही सांत्वना काफी है कि मेरे पुत्र किसी पुण्यात्मा के शाप से नहीं नारायण के हाथों मरकर मोक्ष को प्राप्त करेंगे.

कश्यप दिति के इस वचन से बड़े प्रसन्न हो गए. उन्होंने एक वरदान दिया- तुम्हारे पुत्र तो नारायण के द्रोही होंगे लेकिन एक नाती नारायण का अनन्य भक्त होगा. वह नारायण को अतिप्रिय होगा.

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