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यह कथा ग्रहों की प्रवृति और उनका हमारे ऊपर पड़ने वाले प्रभाव को समझने में सहायक होती है. ज्योतिष विज्ञान ग्रहों के इस भाव और कुंडली में उन ग्रहों की स्थिति से जातक के स्वभाव का अध्ययन कर लेता है.
देवगुरु बृहस्पति से चंद्रमा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. बृहस्पति की पत्नी तारा चंद्रमा की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे प्रेम करने लगी. रसिक मिजाज चंद्रमा भी तारा पर मुग्ध हो गए.
तब स्त्री को अपने पसंद से अपना जीवनसंगी चुनने की स्वतंत्रता थी. तो तारा चंद्रमा के साथ ही रहने चली गई. बृहस्पति इससे बहुत नाराज हुए. उन्होंने चंद्रमा से अपनी पत्नी लौटाने को कहा.
परंतु न तो चंद्रमा तारा को लौटाने को राजी हुए और न ही तारा वापस जाना चाहती थीं. बृहस्पति का तर्क था कि चूंकि तारा गुरुपत्नी हैं इसलिए उन्हें इस निर्णय की स्वतंत्रता इसलिए नहीं है. दोनों अपने-अपने तर्कों पर अड़े थे.
इस बात पर बृहस्पति और चंद्र के बीच युद्ध शुरू हो गया. दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य और बृहस्पति में बचपन से ही बैर था. इसलिए शुक्र चंद्रमा के साथ हो गए. शुक्र आए तो असुर सेना चंद्रमा के साथ आ गई. दक्ष चंद्रमा के ससुर थे. वह भी सहायता को आ गए.
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