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तीनों लोकों का पालन करने वाले श्रीहरि भीतर से तमोगुणी हैं तो बाहर से सतोगुणी. तीनों लोकों को उत्पन्न करने वाले ब्रह्मदेव भीतर और बाहर दोनों से रजोगुणी हैं. शिव संहारक हैं इसलिए इन गुणों से परे हैं.

सुख का रूप सतोगुण है, दुख का रूप तमोगुण है और क्रिया का रूप रजोगुण है. श्रीहरि सृष्टि का पालन करते हैं इसलिए देखने में सृष्टि सुख का रूप प्रतीत होती है परंतु वास्तव में देखें तो यह दुखरूप है.

श्रीहरि का कार्य बाहर से सतोगुणी होने पर भी तत्व से तमोगुणी है. इसलिए भगवान श्रीविष्णु के वस्त्र आभूषण आदि तो सुंदर हैं किंतु स्वरूप श्यामवर्ण है.

शिव सृष्टि का संहार करते हैं. वह देखने में दुखरूप हैं पर वास्तव में संसार को मिटाकर परमात्मा में मिलाना उनका सुखरूप है. इसलिए शिव का बाहरी शृंगार तमोगुणी होने पर भी स्वरूप सतोगुणी है. इसी सतोगुण स्वभाव के कारण वह शीघ्र प्रसन्न भी हो जाते हैं.

ब्रह्मदेव सदा सृष्टि निर्माण करते हैं. क्रियात्मक स्वरूप रक्तवर्ण होता है इसलिए वे रक्तवर्ण हैं. त्रिदेवों में परस्पर कार्यभेद नहीं है. जो भेद हम समझते हैं, वास्तव में वह उनकी लीला है.

शिवपुराण में भगवान शिव के निर्गुण स्वरूप को सदाशिव, सगुण स्वरूप को महेश्वर, विश्व का सृजन करने वाले स्वरूप को ब्रह्मा, पालन करने वाले स्वरूप को विष्णु और संहारक स्वरूप को रूद्र कहा गया है.

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1 COMMENT

  1. Very nice story but I ‘ve one request. Could u plz make a different katha sangrah of Shiv-Shakti related stories in the table of content/ menu like for Bhagwadgeeta, Ramprashnawali etc coz there r very interesting stories related to Mahadev but very less in comparison to that of Narayan n his Avataar related stories. Om Namah Shivay.

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